Friday, 14 September 2018

दिन प्रति दिन में प्रकाशित --

**तीज पर एक गीत**
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आ गया है तीज का त्यौहार सखियाँ झूमती
डाल कर झूला ख़ुशी से आज सब हैं झूलती
आ गया है तीज का त्यौहार सखियाँ झूमती 2
पाँव में महावर लगा के हाथ मेहँदी से रचा
आ गई बेला मिलन की गाल पी के चूमती
डाल कर झूला ख़ुशी से आज सब हैं झूलती
आ गया है तीज का त्यौहार सखियाँ झूमती -2
लाल पीला और नीला वस्त्र पहने हैं सभी
नाचती गाती ख़ुशी से पाँव न ठहरे कभी
हर नज़र हैं आज केवल बस उन्हीं को घूरती
डाल कर झूला ख़ुशी से आज सब हैं झूलती
आ गया है तीज का त्यौहार सखियाँ झूमती -2
चल रही है आज ठंडी और कोमल ये पवन
कर रहीं हों आज जैसे प्रेम से अपना मिलन
प्रेम में होकर मगन वो रीत सारी भूलती
डाल कर झूला ख़ुशी से आज सब हैं झूलती
आ गया है तीज का त्यौहार सखियाँ झूमती-2
संजय कुमार गिरि
                  *छंद*  
भारती के लाडलों ने ,भारती की रक्षा हेतु
दुश्मनों से लड़कर ,जान ये गवाई है ।
आन वान शान हेतु ,तिरंगे के मान हेतु
सीने पर खाके गोली ,वीर गति पाई है
जन गण मन गाके ,रूखा सूखा अन्न खाके 
वीर सपूतों की कहानी बन के छाई है
बहनों की मांग सूनी ,माताओं की गोद सूनी
तब जाके भारत में ,आज़ादी ये आई है
संजय कुमार गिरि
           *गज़ल* 
अब किसी से नहीं गिला अपना
मीत ही जब नहीं रहा अपना
जिस्म से जान ये निकल जाती
सामना मौत से हुआ अपना
आस टूटी नहीं कभी यारो
चल रहा साथ काफ़िला अपना
अब किसी से नहीं रही नफरत
गुलसिता है हरा भरा अपना
राह में वो मिले हमें जब से
प्यार का सिलसिला चला आपना
चल कहीं और घर बना "संजय "
रख किसी से न वास्ता अपना
संजय कुमार गिरि

Saturday, 1 September 2018

कभी छल कपट हम नहीं यार करते
कभी पीठ पीछे न हम वार करते
लगाया न होता गर' इलज़ाम सर पर
कभी हम न तुमसे यूँ' तकरार करते
हमें माँ पिता ने दिखाई जो' दुनिया
वही स्वप्न हम आज साकार करते
दिलों में अगर देश भक्ति न होती
अमन चैन दिल से न स्वीकार करते
न होता कभी हाल ऐसा वतन का
गरीबों को' थोडा जो' उद्गार करते
चलो आज "संजय" बता दो हक़ीकत
कभी हम किसी का न मनुहार करते
संजय कुमार गिरि

Monday, 27 August 2018

हाल जिसको भी सुनाया मैंने अपनी जिंदगी का 
हाँ उसी ने पीठ पर खंज़र चलाया दुश्मनी का 
संजय कुमार गिरि
ग़ज़ल 
नहीं होता कभी लफड़ा हमारा
न करते तुम अगर चर्चा हमारा
लिखा इक शे'र था हमने ख़ुदी से
वो' जांचा और था परखा हमारा
असर होता नहीं अब शाईरी का
रहा जब से नहीं ज़ज्बा हमारा
नज़र में तो थे हम दिलवर सभी के
बदल के रख दिया रुतवा हमारा
नज़र लग जाए ना "संजय" किसी की
महकता ही रहे गुंचा हमारा
संजय कुमार गिरि

विकट परथति में डॉक्टरों पर जानलेवा हमले क्यों   लेखक संजय कुमार गिरि देश में इस विकट समस्या से आज हर नागरिक जूझ रहा है और न चाहते हुए भ...